तड़प है दिल में बहुत उनकी बे-रूखी से ,
दिल को अब आराम कहाँ ।
दिन तो गुजर जाता है , इस शहर की भीड़ भरी गलियों में ।
आ जाती है तनहाइयाँ साँझ ढले ,रात अब कटती है कहाँ ।
बन गए है शायद पैमाने भी मोहब्बत के ,नापती है जिसे उनकी नज़र ।
उतर जाऊं जिस पैमाने में मैं उनके , वो पैमाना मुझे अब मिलेगा कहां ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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