दर्द से रिश्ता बहुत पुराना है ,
दोस्त !
तू कहता है कि ,
समझौता कर ।
मुस्कुराते रह कर ।
किया तो था ,
समझौता हमने ।
अपनी , तन्हाईयों से ।
मुस्कुराये तो थे ,
हम कुछ घड़ी मगर ।
ज़ख्म और भी ,
कुछ ताजे मिल गए ।
वक़्त लगेगा इन्हें भी ,
शायद भर जाने में ।
हो जाएंगे यह भी सुमार ,
अब ।
मेरे गम के , खजाने में ।
मुस्कुराऊँ भी कैसे ,
फुरसत ही नही मुझे अब ,
अपने गम से ।
मसरूफ़ ही रहता हूँ ,
मैं आज कल ।
अपनी तन्हाईयों में ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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