एक बेरोजगार मैं भी हूँ साहब !
सात महीने से खाली हूँ ।
कुछ काम हाथ का और , आता ही नहीं साहब !
सीखा ही नहीं , मौका ही कुछ ऐसा मिला कि ।
सीखने की जुर्रत , महसूस ही नहीं की ।
जो काम आता था , वो मिलता ही नहीं ।
सीखा है किया है अनुभव है ,
मगर उतना , पढ़ा लिखा भी नहीं साहब !
उसमे भी अब स्नातक और ,
डिप्लोमा मांगते है साहब !
काम बहुत है करने को पर करें क्यों ?
दो चार नौकरी मिली भी थी ,
किन्तु नौकरी अपनी , समझ की थी ही नही ।
कर तो सकता था मैं मगर करना क्यों ?
सरकार को भी तो , कोसना है साहब !
बस यही तो सब कर रहे अधिक तर ,
मैं भी कर लूं तो हर्ज क्या है ? साहब !
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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