मेरे एहसासों में सामिल है , यह किसी की "आदत का लगाना"
कोशिश बहुत की मैने के , यह लत मेरी छूट जाए ।
न जाने कैसी है यह प्यास के , उनके बैगर बुझती ही नही ।
नशा भी अजीब सा है इश्क , दीवानगी की हद से भी गुजर गई है अब ये ।
जो न थी फितरत में , मेरी कभी ये ।
अब उनके हुस्न के दीदार बिन ,दिल से रहा जाता नही ।
खाली ही रखा है , हिफाज़त से मैंने ।
अपनी जिंदगी की , किताब का एक खास पन्ना ।
क्या पता मेरे जिंदगी के , उस पन्ने पर खुदा उन्हें लिख जाए ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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