ख्यालों में कई बार जीता है , कई बार मरता है ।
कवि है साहब ! समुद्र की लहरों से ,
तूफानों से कभी पहाड़ों से ।
कभी रेगिस्तानों से तो ,
कभी चट्टानों से , टकराना जानता हैं ।
कवि है साहब !
जो न टूट सके किसी से , वो कवि "प्यार में" ।
चाँद तारे खुशी-खुशी , तोड़ लाता है ।
कवि है साहब !
खुशी मिले या गम, चाहे हो वो किसी के ।
हर किसी के गम और खुशी में ,
खुद को ढालना जानता है ।
कई बार जीता है , कई बार मरता है ।
कवि है साहब ! हर किरदार को ,
ब-खूबी निभाना जानता है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी।
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