किस पर करें एतबार के , कसम हर कोई खाता है ।
"तेरी कसम" से ही , हर कोई अपना बन जाता है ।
लगता है मानों यह मेरा ही है , अज़ीज़ है चाहने वाला ।
बस तेरी "कसम से" ही , मुझे हर बार मार जाता है ।
रह गया है प्रेम "तेरी कसम" बनकर ।
आज इस गली तो , कल उस गली ।
अभी भी कुछ रिश्तों में , भगवान स्वरूप प्रेम जिंदा है ।
ठिठुर कर कभी अलसाये हुए , कंपकपाते हुए होंठो से बुदबुदाते हुए ।
अपने होने का एहसास दिलाता है ।
मगर इस आधुनिकता में , कौन उसे पहचानता हैं ।
बस "तेरी कसम" का नशा ही है , शैतान प्रेम वो ।
जो बे मौत अक्सर , हर किसी को मार जाता है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।
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