मंत्र मुग्ध हो गया हूँ मैं आज , देखा जो मैने आपको ।
मन के शब्दकोश से , ढूंढ रहा हूँ अब शब्द ।
उपमा करूँ मैं , जिससे तेरी ।
तेरा सजीला रंग , तेरा यौवन नूतन , खिला रूप तेरा निराला ।
करूँ किस से तेरी तुलना , और कोई न भाए मन को मेरे ।
नही है वर्णित कदाचित , अभी तक ।
मेरे मन के शब्दकोश में , ऐसा कोई शब्द जो ।
तेरी प्रसंसा में उतर जाए खरे ।
हे मेरी मनमोहनी तेरे मोह में , मैं बंध गया हूँ ।
छटपटाहट मेरे मन की ऐसी, जैसे मीन , बिन जल की ।
यह दशा है कैसी ,स्वयं से अब मैं , दूर चला गया हूँ ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें