वो कोई अब नहीं पूछता , हाल ए दिल । बनते फिरते थे जो हकीम , हमारी सलामती पर । शिफा की जरूरत थी अब , और वो नदारद है , हमारी गम ए महफिल से । आंखे पथरा गई है , उनकी राह निहारते । न जाने वो हमारी सूनी महफिल में , आएंगे कब। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
इतना न इतराओ तुम ! तितलियों की तरह ।
किसी दिन फूल बनकर ,
मैं तुम्हें ।
मज़बूर कर दूँगा , मुझमें सिमट जाने को ।
फिर न जाने दूंगा वापस ,
मैं तुम्हें ।
अपने गुलसिताँ से ।
किसी और गुलसिताँ के गुलों में , सिमट जाने को ।
🤪🤪🤪🤪🤪
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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