ऐ चाँद तू , देना गवाही ।
कैसी गुजर रही है मुझ पर ।
हाय रे ! ये तन्हाई और ये शब ए गम ।
है करीब मेरा , चिराग ए उलफत ।
और महरूम हूँ , उसकी रोशनी से मैं ।
दूर ही बेहतर था , उम्मीद पास आने की में ।
जी तो शकुन से , रहे थे अब तलक ।
हाय रे मुकद्दर ! पास होकर भी ।
मिलने को मजबूर हुए हम ।
ऐ चाँद तू , देना गवाही ।
कैसी गुजर रही है मुझ पर ।
हाय रे ! ये तन्हाई और ये शब ए गम ।
कैसे आएं वो ख्वाब बनकर भी ,
बैरन बन गयी निंदिया मोरी ।
इन अँखियन में नींद न आये ।
झर झर अँखियाँ नीर बहाये ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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