अपना घर था , आनंद से रहना नही आया ।
आपसी की फूट-लूट में , बाहरी लोगो ने मज़ा है पाया ।
ले के मदद गैरों की , अपनों को बर्बाद किया ।
खुद भी कहाँ बच पाया कुल द्रोही , अपना भी राजपाट गवां दिया ।
भारत की बात कह रहा हूँ मैं ,
सदियों से जो गुलाम रहा ।
हिन्दू रहा हिन्दू का दुश्मन , तभी तो मुगल-अंग्रेजों और यवनों ने यहाँ राज किया ।
आये कई लुटेरे यहाँ और लूटा , माँ भारती की अस्मत ।
रहे मौन-खामोश ही , वो लूटते रहे और हम लुटते गए ।
फिर भी न हम एक हुए ,जातियों के भेदभाव में निरंतर बंटते ही गए ।
कुछ वीर सपूतों ने , अपना रणकौशल दिखलाया ।
कुछ माता-बहनों ने जौहर से , अपना स्वाभिमान बचाया ।
हुए कई बलिदान स्वाधीनता की बलि-वेदी पर , तब जाके अपना स्वाभिमान अधिकार वापस पाया ।
कुचक्र कुचाल की बिसात पर , स्वाधीनता के बाद कुछ लोगों ने ऐसी चलें चली ।
किये खंड भारत के , मज़हब के नाम पर ।
शासन के लोभी बने भोगी , भारत को लहुँ लुहान कर ।
धर्मनिर्पेक्षता का रचा , सडयंत्र लाठी वाले ने ।
फिर बिछा दिए अंगारे झुलसाने को , सनातनधर्म की राहों पर ।
अब लपटें उठ गई , कोहराम मचा है चारो दिशाओं में ।
ज़ुल्म बहुत हो चुका अब , सनातन अब जाग उठा ।
हिंदू राष्ट्र अखण्ड भारत हो अब , हिन्दू अब ये मांग उठा ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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