इम्तिहान लेता है , इश्क भी शायद ।
दिल जो है पागल मेरा ।
ले गया मुझे उस राह गुजर की ओर ,
जिस राह से गुजर थी तेरी ।
सोचा मिलना तो नशीब न हुआ ,
चलो दिल की सही , मान लेता हूँ ।
के दिख जाए एक , झलक ही तेरी ।
ज्यादा नही तो दो , लफ्ज़ ही सही ।
हो जाती मुलाकात थोड़े ही ।
मगर अफसोस की , तुम तेज कदमी से चले ।
मुड़ कर भी न देखा , इक बार भी मेरी ओर ।
रोये बहुत हम मगर अश्कों को ,
पलको से न गिरने दिया ।
दिल को मनाया ब-मुश्किल से फिर मैंने ।
कहीं कोई पूछ न ले सबब मेरे गम का ,
मुस्कुराकर अश्क मैं पी गया ।
ये दिल ही है पागल मेरा ,जिस राह से गुजर थी तेरी ।
मुझे उस राह की ओर ले गया ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें