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दास्ताँ नही है अलग तेरी शायद , मेरी दास्ताँ से ।

 दास्ताँ नही है अलग तेरी शायद , मेरी दास्ताँ से ।

 दर्द ओ गम से भरा है दिल मेरा ।

यह जो छलक रहा है दिल से , नज़्म ए अल्फ़ाज़ बनकर ।

 कोशिशें तमाम की , दर्द भूल जाने की मगर ।

इन जख्मों का क्या करें ?

ये जो रिसते है , नासूर बनकर ।

होती नही है अब मेरी , सकून की वो रातें  ।

न वो पहले सी रही उनसे , प्यार भरी बातें ।

अब तो मुलाकातें ही , रह गयी है उनसे ।

सिर्फ , बदस्तूर बनकर ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

 

  

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