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कोई दिल अपना , हाथों में लिए खड़ा था ।

हाल ए दिल पेश करूँ क्या , उलफत में ।

जिधर भी देखा  उधर ही , कोहराम मचा था ।

हर कोई लिए था , फसाना अपने दिल का ।

कोई मसल रहा था , हाथों से  सीना अपना ।

कोई दिल अपना ,  हाथों में लिए खड़ा था ।

बड़ा कंज़र्फ है यह इश्क भी ,लूटा है ,

हुस्न ने हर किसी को ।

फिर भी इश्क लिए , हुस्न की राह पर ।

हर कोई , सख्स खड़ा था ।

संभल गया हूँ मैं  मगर ,

प्रतीत मेरे दिल का कोई नही ।

न जाने कब उठे लहार , ज्वार बनकर ।

हुस्न की गलियों में , बिखर जाने को ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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