क्यों उड़ाते हो , मखोल मर्दों का ।
दर्द में कहाँ नही चले संग ।
खुशी कौन सी न दी , मर्दों ने औरतों को ?
कब न किया सम्मान ?
कुछ बेगैरत के कारण ,
आज न उड़वा हंसी सब मर्दों की ।
आसमान के बिना धरती ,
का बजूद कहाँ ।
माना सितारे गर्दिश में , हो आज शायद !
न चमके कभी , ऐसा तो नही ।
सूरज सा है मर्द , औरत सृष्टि ,
सूरज बिन सृष्टि का निखार कहाँ ।
दोनों है , इक दूजे के पूरक ।
एक न हो तो ,दूजे का अस्तित्व है कहाँ ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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