मानो सदियों गुज़र गईं हो , मुलाकात हुए ।
अभी कुछ ही रोज़ की तो बात थी , उनसे मुलाकात हुए ।
ऐ मेरे दिल की बेचैनी , तुझे क्या नाम दूँ ।
दीवाना तो उसने, कह ही दिया है तुझे । इसके सिवा मैं , और क्या कहूँ तुझे ।
सब्र कहाँ गया है अब तेरा , क्यों बैचैन हुआ जाता है ।
सब्र रख , कुछ दिनों की बात है ।
वो आएंगे ज़रूर , वो वादा जो कर गए ।
इशारों में ही सही , तुझसे वो इहज़हर ए इश्क ।
वो , कर गए ।
हाल ए उलफत का, नही जुदा है ।
उनके दिल का , तुझसे अलग ।
जुदाई में उनके अश्क , यह बयाँ कर गए ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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