मैं सिमट कर , सिकुड़ कर रह गई हूँ मैं ।
मेरे विशाल स्वरूप को....तेरी कायरता ने.....तेरे लालच
और तेरी स्वयं की महत्वाकांक्षा , और आपस की शत्रुता ने ।
लुटवाया है तूने मुझे ।
मैं असहाय लुटती रही , खंडों में बंट कर रह गई हूँ मैं ।
सदियों से लहुँ लुहान हूँ मैं , शत्रुओं ने रौंदा है मुझे ।
तू सहिष्णु ही रहा बन कर , कल भी और आज भी ।
समझ भाषा शत्रु दल की , न उसकी हाँ में हाँ मिला ।
संगठित हो संघर्ष कर , रख दृष्टि गिद्ध सी ।
शत्रु दल की , हल चल पर ।
यह रण है तेरे अस्तित्व का , तेरे स्वाभिमान का ।
छल से छला है जिसने तुझे , ले प्रतिशोध उसे कुचल कर ।
दिखला दे तू अपना रणकौशल , जग को यह बतला दे तू ।
मैं तेरी माँ भारती हूँ , तू मेरा सनातन ।
वंदेमातरम !
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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