आज फिर उठा दर्द , कशमकश का ।
द्वंद हुआ मुझ में , और मेरी बेबसी में ।
कोसा छक कर , अपनी किस्मत को ।
और , रोया भी जी भर ।
उलझनों में ही , उलझ कर रह गई ।
मेरी , ये जिंदगी ।
ज्यों ज्यों की कोशिशें , सुलझाने की ।
त्यों त्यों और उलझते ही गए ,
मेरे हालत ए गुर्बत ।
मिले राह भी तो कैसे ?
सायाँ बन कर जो , फिरता रहा पीछे मेरे ।
मेरा बैरी मुकद्दर ।
क्यों रखूं मैं तुझ पर , एतबार अरे वो !
आसमाँ वाले ।
कैसे जी रहा हूँ मैं , मर मर कर ।
कभी तूने देखा है मुझे , जमीं पर आकर ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।
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