करूँ किससे बात यहाँ , किसको फुर्सत यहाँ मेरे लिए ।
हर कोई उलझा हुआ है यहाँ , अपनी उलझनों में ।
चलो... वैसे भी किसके पास है , वक्त यहाँ किसीके लिए ।
हर कोई मसरूफ है यहाँ , अपनी कुछ न कुछ कहने के लिए ।
चलो बेहतर है खामोशी , किसी से न कोई प्यार न मोहब्बत ही ।
मस्त हूँ मैं यहां , न रंजिस न सिकवा न मुखालफत ही ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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