न मैं शायर हूँ , न कवि हूँ ।
मिल जाते है शब्द जो ,
"अनुभूति के"
बस उसे ही लिख लेता हूँ ।
न मैं रस की जनता हूँ ,
न श्रृंगार की ,
बस भा जाये मन को जो ,
उसी को श्रृंगार ,
समझ कर मैं , श्रृंगार कर लेता हूँ ।
हाँ दर्द ज़रा , करीब है मेरे ।
उसी को अक्सर , सहला लेता हूँ ।
मिल जाये दर्द में जो दर्द ए हर्फ़ ,
उसको लिख लेता हूँ ।
न मैं शायर हूँ , न कवि हूँ ।
मिल जाते है शब्द जो ,
"अनुभूति के"
बस उसे ही लिख लेता हूँ ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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