ठहर गया हूँ मैं अब ,
जाते -जाते तेरी , इस महफ़िल से ।
मन को भा गया है मेरे ,
हर फनकार तेरी , इस महफ़िल के ।
हर दर्द से हुआ वाकिफ मैं ,
और किसी के , सकून से भी ।
हुआ है एहसास गम ओ खुशी का
तेरी इस , महफ़िल से ।
छोड़ कर जाऊं भी तो कैसे ?
दर्द ओ सकून की , तेरी इस महफ़िल से ।
माना नही है किसी की नज़र ,
मुझ पर शायद ।
रहूं कैसे दूर मैं उनसे ,
जो भाया हो , मेरी नज़र ।
ज्यादा नही तो कुछ तो हैं ,
करदान मेरे गम ए ग़ज़ल ,
बस ठहर हूँ अब ,मैं उनके लिए ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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