यह घनघोर रात है सघन , आंखों के पास भी कुछ दिखता नही ।
जुगनुओं की आड़ में , रास्ता नापा जाए ।
चलो सब मिलकर , कोई रह न जाये ।
भोर के उजाला की , प्रतीक्षा में कब तक बैठे रहेंगे ।
समय की गति को , हम तुम रोक न सकेंगे ।
क्यों न समय के , साथ साथ ही चला जाए ।
चलो सब मिलकर , कोई रह न जाए ।
काल है प्रतिकार का , मौन बनकर अब न जिया जाए ।
चीर कर अंधेरों को , सुख की कोई किरण निकाली जाए ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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