चले भी न दो कदम हम ,साथ मिलकर ।
न बैठे ही तन्हा , कुछ घड़ी हम दोनों ।
हवाओं के झोकों सा , हुआ एहसास ।
दिल पर , उनके छूने का ।
बस यही मुलाकात हुई ।
इंतज़ार में रहा मैं ,
आज नही तो कल ही सही ।
शायद मिल जाए , वो मुकद्दर से ।
किसी , मुकाम पर ।
खबर आयी के वो ,
वापस अपने शहर ।
बिना मिले ही ,जा रहे हैं ।
पहगाम बस , इतना ही मिला मुझे ।
के वक्त की , नज़ाकत को समझो ।
खुदा ने चाह तो , फिर मिलेंगे ।
किसी मुकाम पर कहीं ।
कितना खुश , हुआ था दिल मेरा ।
उनके आने पर , मेरे शहर ।
हाल ए दिल यह है अब ,
अश्क बह रहा है जी भर ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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