आज रोने को , दिल बहुत चाह रहा है ।
सब तो है मगर , न जाने फिर ।
किस को खुद में , खोजता फिरे जा रहा है ।
आज रोने को , दिल बहुत चाह रहा है ।
शकुन से , बे-शकुन क्यों कर हुआ दिल ।
न जाने शकुन ए तदवीर , क्या हो अब इसकी ।
चुप चुप ही है अब , और अश्क रोके जा रहा है ।
आज रोने को , दिल बहुत चाह रहा है ।
मज़बूर क्यों हुआ ये आज , क्या गम है ।
जो गम इसे रह रह कर , यूँ सता रहा है ।
दर्द बहुत छुपा है , शायद इसमें ।
छलक ही गए अश्क रोके न रुके अब ।
पढ़ सके शायद वो , इसके अश्कों में ।
जिसको यह अपनी बेबसी , बताना चाह रहा है ।
आज रोने को , दिल बहुत चाह रहा है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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