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हक़ दिया था हमने आपको !

हक़ दिया था हमने आपको !

अपना हमदर्द , 

हम नवाज समझ कर ।

वाह ! क्या वफ़ा से निभाई , 

आपने मोहब्बत ।

हमें जमाने में रुस्वा कर ।

 फिर भी हम सहते रहे , 

तेरा दिया हुआ "हर दर्द" ।

तेरी कुछ लम्हों की मोहब्बत को , 

हम याद कर ।

वफ़ा में अब , तुम ही नही । 

चलो फिर भी हम इल्ज़ाम ,

बेवफाई का हम ।

खुद पर लिया करते है , "मोहब्बत"

वक्त का यही तकाज़ा हो शायद , 

वक्त को ही हम अपना , मुकद्दर समझकर ।

होगा एहसास जो तुझे , मेरी "मोहब्बत" 

का , चले आना ।

दिल में मेरे अब भी वही , 

मोहब्बत है तुम्हारे लिए  ।

दिल में मेरे तुम अब भी धड़कते हो ।

मेरे दिल की , धड़कन बनकर ।

✍️ ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।



 

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