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इम्तिहान ही इम्तिहान उफ न जाने ।

इम्तिहान ही इम्तिहान उफ न जाने , 

कितने और इम्तिहान लेगी तू ऐ जिंदगी।

बाल काल से अब तक , 

न जाने कितने इम्तिहानों से , मैं गुजर गया हूँ । 

अब बस भी कर , अब मैं थक सा गया हूँ ।

सोचूं तो क्या सोचूं  हल अब , 

तेरे इस नए इम्तिहान का ।

कोई राह नही सूझती है अब , 

ना जबाब तेरे सवाल का।

नही सूझती है , अब कोई राह नवेली । 

दिमाग में अब भी , और कई पुराने सवाल है ।

कोई राह  तू ही  दिखा मेरे  प्रभु ! 

यह मेरे जिगर की , जिंदगी का सवाल है ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी 

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