मत कर हतास , अपने मन को ।
"ऐ प्राणी !"
पल भर का है , महमां अंधेरा ।
किसके रोके , रुका है सवेरा ।
ग़म की ये रात जरूर जाएगी ,
"हिम्मत न हार"
सुख की सुबह जरूर आएगी ।
मिलता नही हर किसी को ,
चाह अपने मन का ।
मत कर मन तू अपना , उदास प्राणी !
न बन दुश्मन तू , अपने जीवन का ।
न भटक तू बेमतलब के ,
ख्वाहिशों के इन अंधेरों में ।
निकाल आ बाहर तू ,
अपनी ख्वाइशों के घेरों से ।
पहचान अपने बजुद को ,
किसलिए तू यहाँ आया है ।
न निराश कर मन को ,
आशाओं के दीप जला ।
रहेगा प्रजवालित दीप तेरा सदा ,
सुख दुख के इन फेरों में ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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