कहाँ समझ पाया मैं कभी , चाहत और इश्क को ।
अब समझा हूँ तो , अब उम्र निकल गयी ।
यूँ तो दुनियादारी से , नही हूँ बेखबर ।
दुनिया ऐसी भी है , मोहब्बत की ।
ये , ना थी खबर ।
रहा वक्त जब इश्क और , चाहत का ।
हम ज़ाम ए शराब , के दीवाने थे ।
किया बर्बाद , खुद को बेवजह ।
अब संभाले भी तो ,अब जवानी निकल गयी ।
सोचता हूँ कि रही होगी , ये हंसीं दुनिया तब भी शायद ।
हम ही नही , पहचान सके ।
अब पहचान पाए तो , अब उमंग निकल गयी ।
है "मलंग" अब दिल का आशियाना , लुटा हुआ ।
शोर ओ शराबा , बहुत है इर्दगिर्द ।
मगर दिल तन्हां ही है , अंदर ही अंदर घुटा हुआ ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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