न समझ में आयी ,
कभी उनकों हमारी उल्फत ।
दर्द भी रहा खामोश मेरा ।
अश्क कुछ बयाँ कर पाते ,
उनको भी पलकों ने रोका ।
खुद ही की उल्फत उनसे ,
और खुद ही खाया धोखा ।
सज़ा कबूल है हमें ,
इल्ज़ाम ए इश्क ।
तुम जो चाहे सजा दे दो ,
तुम्हारे दिल में क्या है ?
इसका हमें , पता दे दो ।
ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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