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अब ये बताओं के कौन कौन है , दीवानों की तरह इस की महफ़िल में ।

अब ये बताओं के कौन कौन है , 

दीवानों की तरह इसकी महफ़िल में ।

मैं ही हूँ या कोई , और भी है जलने को ।

परवानों की तरह , इस महफ़िल में ।

कितने है हुए घायल , 

सताए हुए हुस्न की जफ़ाओं से ।

हम तो हुए हतास , हुश्न की वफाओं से ।

मयकशी भी होकर देख लिया , 

हुस्न ए मयकदे में ।

कहाँ शरूर रहा अब , 

जाम ए शराब ए हुस्न में ।

अब वो मदहोशी कहाँ , 

साकी की उन अदाओं में ।

चढ़ जाये करती थी , जो इक बार तो । 

याद रहा करती थी वो खुमारियों में ।

अब तो आलम , यहाँ तलक ही है "मलंग" 

बनकर अश्क बहे है ।

दफन हुए है अरमान दिल के , दिल की गलियों  में ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी


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