मैं ही रही अक्सर साथ तेरे ,
तेरा हमकदम बनकर ।
तू खुद में ही खोया रहा मैं,
साथ साथ चलती रही तेरे ।
तू कहीं पर ठहर गया तो ,
रुकी मैं भी ।
तुझे छोड़ कर मैं कभी न गई ।
ये बात अलग है ,
रहा तू ही बेपरवाह मुझसे ।
मैं तेरी परवाह में ,
अकसर तेरे ही साथ रही ।
खुशी के पलों में ,
औरों की तरह ही ।
झुमती मैं भी , तेरे साथ रही ।
हुए जुदा सब गम ए दौर से ,
जब गुजरे तुम ।
मैं तुझे छोड़ कर , फिर भी न गई ।
जाऊं कैसे मैं बिन तेरे ?
मैं तो तेरे साथ ही , इस जहां में हूँ आई ।
तेरे हर सुख दुख में , तेरा साथ देने को ।
क्या सोच रहे हो , यही के कौन हूँ मैं ?
अरे मैं हूँ तेरी परछाई ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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