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इंतज़ार ही में गुजर जाता है , मेरा वक्त ।

इंतज़ार ही में गुजर जाता है , मेरा वक्त ।

न ख्याल दिन का है मुझे  ,  कब ढला ।

न एहसास रात का है मुझे , के कब हुई ।

रहता हूँ यादों में तेरे ही , खोया खोया सा ।

न होश सुबह की के कब हुई , न ख़बर शाम की के कब ढली ।

आ जाओ  अब तो , आलम यह है के लोग कहते है ।

हम खुद से ही , गुफ्तगू करने लगे है ।

 दिखने लगे हो तुम , मुझे हर तरफ अब ।

बे शुद सा हूँ और , ज़ुबाँ पर नाम तेरा ही ।

कैसे समझाऊं मैं इस दिल को ,  के लोग मुझे अब ।

दीवाना कहने लगे है ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।


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