सन्नाटों में ही गुज़रे है , जिंदगी के लम्हें कुछ इस कदर ।
खुद की सदाओं से भी अब हमें , डर लगाने लगा है ।
बुझा दो ये उल्फत ए चिराग के हमें , अंधेरे रास आ गए है ।
इन चिरागों से भी अब हमें , डर लगने लगा है ।
तन्हा ही काट लिए हमने , सफर यह जिंदगी का ।
बस चंद फासला और ......
वो भी कट जाएंगे , तुम जाओ हमें तन्हां ही रहने दो ।
हमसफर से अब हमें , डर लगने लगा है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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