यूँ ही जोड़ लिया करता हूँ मैं अक्षर ,
अलसाये हुए से ।
थके मुरझाये हूऐ शब्दों से ,
अपने मन की अनुभूतियों को ,
लिख लेता हूँ ।
मैं न जानू छन्द-बंध , किन्तु ।
हृदय-समुद्र की लहर , लिख लेता हूँ ।
ब्याकुल मन की व्यथा और ,
हर्षित चित की चंचलता ,
मिलन की खुशी और जुदाई की ,
बिरह लिख लेता हूँ ।
थके-हारे लड़खड़ाते पगों की ,
गति लिख लेता हूँ ।
इस तरह से ही मैं , एकान्त में बैठे कर ।
अपने मन का बोझ , कम कर लेता हूँ ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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