मकबूल न इश्क , न आशिकी ।
खाक हुआ सब , हसरत ए गुलसिताँ तेरा ।
खुद को खो कर भी , क्या हासिल हुआ ?
बता ऐ दिल !
शाम ए गम और , तन्हाइयों के सिवा ।
रही न अब आरज़ू ए नज़र , खुद को देख पाने की ।
उम्मीदों का आईना भी अब , चकनाचूर हुआ ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।
मकबूल न इश्क , न आशिकी ।
खाक हुआ सब , हसरत ए गुलसिताँ तेरा ।
खुद को खो कर भी , क्या हासिल हुआ ?
बता ऐ दिल !
शाम ए गम और , तन्हाइयों के सिवा ।
रही न अब आरज़ू ए नज़र , खुद को देख पाने की ।
उम्मीदों का आईना भी अब , चकनाचूर हुआ ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।
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