"जख्म कितने तेरी चाहत ने दिए है मुझको...."
आना कभी इत्मीनान से इक बार ,
दिखाउंगी फिर मैं तुझको.....
बे-गैरत भी न होगा , शायद जमीर तेरा ।
जो मेरा हाल ए दिल , जानकर ।
जो तू न रो दिया ।
मेरी वफाओं का सिला , क्या खूब मुझे ये जो मिला ।
इक तेरी बेरुखी ने , ऐ मेरे संगदिल सनम !
तेरी जफ़ाओं का गिला भी , करें तो क्या करें तुझसे ।
हर शिकायत में मेरे दिल को , हर बार दर्द ही मिला ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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