यूँ तो कई मिले राहगीर मगर , मिला ना कोई हमसफर दिल का ।
हम हर मुकाम पर साथ रहे , हर किसी के ।
मगर कोई साथ न , रहा मेरे दिल के ।
रही तलास सदियों से , कोई तो चाहे इसे ।
मिले कोई हो जिसे एहसास , मेरे गम ओ खुशी का ।
सब सफर में बिछुड़ते गए , सब अपने अपने मुकाम पर ।
मैं ही चलता रहा ,चलता रहा अकेले ही ।
अब भी सफर जारी है , किसी हमसफर की तलास में ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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