तुझे मालूम ही है मेरी ,
हाल ए मोहब्बत की , अब वो बात कहाँ ।
आया हूँ इस शहर में भी , अजनबीयों की तरह ।
कुछ तलब सी थी ,
दिल की ख्वाइश , जो हम यहाँ आये ।
दूर-दूर एक डाल पर ही , बैठे रहे हम ।
अजनबियों , की तरह ।
हाँ एक बात जो , खास वो ये रही अब ।
मुकुरने की अदा सिख ली , दर्द दबा कर
अब हमने ।
शाक से टूटे , फूलों की तरह ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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