मन तो मन है ,
इसी से चाह मोह लोभ , और क्रोध है ।
मन से ही प्यार है ,
मन से ही त्याग , और बैराग है ।
मन तो मन है ,
इसका न तो कोई आकार है ,
न ही कोई प्रतिविम्ब ।
मन तो शीप के खोल , में बैठा मोती है ।
फर्क है तो बस इतना ,
मोती भौतिक है , और मन अलौकिक ।
मन नाज़ुक है , मन अनियंत्रित अश्व है ।
मन कच्चा भी है , मन बच्चा भी है ।
निष्ठुर भी है , तो दयावान भी है ।
मन का कहाँ एक ठहराव , मन तो मन है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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