तुम याद आते हो बहुत , इस अंजुमन में ।
अब नही है वो बात ,तेरे बाद इस अंजुमन में ।
खामोशी है अब ,माना के भीड़ बहुत है ।
हर कोई मसरूफ है खुद में ही ।
नही किसी को किसी से ,
सरोकार अब इस अंजुमन में ।
तुम थी तो बहार थी ,
कलियों में मुस्कुराहट थी ।
तुम बिन सूना है अब यह जहाँ , न उमंग है अब कोई ।
आ जाओ लौट कर के , बहुत हो गया है तेरा रूठ जाना ।
मुरझा गए है फूल , तुम बिन यहाँ दिलों के , इस अंजुमन में ।
✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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