इश्क गुनाह तो नही था ,
गुनाह तो इसे , हुस्न ने बना दिया ।
ये हुस्न का किया धरा है सब ,
जिसने हर जान को , लुभाया उकसाया ।
और फिर....फिर इलज़ाम , इश्क पर लगा दिया ।
वारदात में इश्क अकेला , कहाँ है कसूरवार ऐ दोस्त !
हुस्न की अदाएं भी तो , कम गुनाहगार नही ।
इठलाती बलखाती हुई , मचलती हुई ।
कभी मंद मुस्कान ,
कभी नैनों से , काम बाण चलाती हुई ।
इश्क को , मदहोश कर जाती है ।
मैं इश्क हूँ तू हुस्न है ,
हमसे ही है जहाँ प्यार का , फिर क्यों ?
तू मुझे यूँ अकेले ही , बदनाम किये जाती है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें