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मैं अधरों को सिल कर , बैठ गया हूँ ।

 मैं अधरों को सिल कर , बैठ गया हूँ ।

नीर आंखों से , बहाता गया हूँ ।

देखता रहा मैं , तमाशा भीड़ का ।

देश को आग में झोंकने का , खंड खंड में बिखेरने का ।

मैं दूर ही खड़ा  रहा मन में , कई सवाल लिए ।

ढूंढता रहा हूँ  मैं जवाब , अपनी इस खामोशी का ।

 बोल पाता मैं काश ,निर्भय होकर । 

काश भय कोई मेरा हर लेता ।

ज्ञान की पेटिका मैं अभाव है , 

कुछ कहने समझने का ।

शायद तभी कुछ , नही कह पाता मैं ।

वो जो लेकर बैठा हूँ , दिल मे मैं ।

काश मेरे ज्ञान पेटिका की , कोई कमी हर लेता ।

आखिर , आखिर कब तक !

कब तक,  रौंदा जाऊंगा मैं ।

सहिष्णु बनाकर कर ।

कब तक रहेगी छाया , 

मेरे ऊपर उस लाठी वाले की ।

कब तक , मर मर कर जीता रहूंगा मैं ।

"अहिँसा परमो धर्म: " 

का अधूरा ही मंत्र , कब तक रटता रहूंगा मैं ।

हाँ मुझे अब , "धर्म: हिंसा तदैव च" को अपनाना होगा ।

लाठी वाले का दिया ज्ञान , अब भुलाना होगा ।

अपने बजूद के लिए , देश की अखंडता के लिए ।

देश के दुश्मनों से , यतोचित अब मुझे लड़ना होगा ।

🚩जय सनातन ! 🚩 🇮🇳भारत माता की जय !🇮🇳

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी ।






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