नही मिला अभी तलक , ऐसा हकीम कोई ।
मर्ज मेरे दिल का जो , पहचान सके ।
मिले अब तलक जो भी ,
हर हकीम वो , कवायत ही निकले ।
दर्द ए दिल छुपा कर , हम हँस क्या दिए ।
लिया लुफ्त हर किसी ने , मेरी मुस्कुरुहट का ।
न मिला अभी तलक , ऐसा हमदर्द कोई ।
दर्द मेरे दिल का जो , पहचान सके ।
मिले अब तलक जो भी ,
हर हँसने वाले वो , तमाशाई निकले ।
नही मिला अभी तलक , ऐसा हकीम कोई ।
मर्ज मेरे दिल का जो , पहचान सके ।
✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी
कवायत= अज्ञानी , न समझ ।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें