अपनों का दिया हुआ ज़ख़्म , भर तो जाए मगर ।
एहसास-ए-दर्द दिल से , कभी जाता नही ।
रह रह कर कश्क , उठने लगती है दिल पर ।
उनकी जफ़ाओं की , जब याद आती है ।
न खबर हमें ।
शाम ओ सुबह की , कब ढली कब आती है ।
कब दिन कब रात , ढलती और निकल आती है ।
वो अपने थे जो मेरे , मुझे मझधार में वो छोड़ चले थे ।
गैरों ने थमा हाथ फकत ,
डूबती कश्ती को मेरी , सहारा मिल गया ।
उन अपनों से , बेहतर गैर निकले ।
जिनसे कश्ती को मेरी , किनारा मिल गया ।
अब न मलाल है हमें , जिन्दगी से न शिकायत ही ।
दूर ही सही मगर ,
अपने दिल के , अंधेरों के लिए मुझे ।
उजाले का कोई , सितारा मिल गया ।
✍🏼ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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