गुजरें हैं आज , बर्षों बाद ।
जिन रास्तों से , छुटपन में कभी गुजरे थे हम ।
चले गए हैं आज , पीछे बचपन के दिनों में हम ।
वो झरनों , प्रपातों का , बहता निर्मल जल ।
थके हारे खेल कूद से लौटे ,
और कंठ को तर कर पी जाते थे जल ।
वो डाली अमवा की , जिसके छांव तले
थकान बिसराते थे हम ।
याद आया फिर ,
ऊँची ऊँची शाखों में अमवा की ,
चढ़ना और उन्हें हिलाना ।
रोमांचित से भरा , वो समय का होना ।
मन का , प्रफुलित और खिलखिला जाना ।
गुजरें हैं आज , बर्षों बाद ।
जिन रास्तों से , छुटपन में कभी गुजरे थे हम ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
बहुत सुंदर
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