आज घटाएं , घनघोर उमड़ रही है ।
शीत में मौसम , बन रहा है बरसात का ।
मैं छतरी ले आया हूँ , शायद बरखा लगने वाली है ।
अब डर की कोई बात नही है , जितनी मर्ज़ी बरसात हो ।
बस मौसम यूँ ही बना रहे , मस्त मस्त लाजबाब सा ।
कपड़े पहने हुए है हम , ऊनी नरम नरम ।
शर्दी जुकाम का भय नही है , जगी हुई है अंगीठी गर्म गर्म ।
चाय की प्याली तुलसी वाली , और काढ़ा आयुर्वेदिक का ।
संग संगनी के लगी है गप्पसप , पता भी न चला दिन रात का ।
आज घटाएं , घनघोर उमड़ रही है ।
शीत में मौसम , बन रहा है बरसात का ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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