तन-मन निर्मल तेरा , निर्मला तू मेरे मन की ।
मन व्याकुल है , मिलन को ।
आलिंगन को , चित मेरा आतुर है ।
मुख मंडल चन्द्र सा तेरा , चंद्रिका तू मेरे मन की ।
अपने चंद्र की चंद्रिका में ,
स्नान करने को , चित मेरा आतुर है ।
साँसें मनमोहक सुगंधित है तेरी , सुगंधा तू मेरे मन की ।
अपने सुगंधा की सुगंध में ,
समा जाने को , चित मेरा आतुर है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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