कहाँ बचा है वक्त , किसी के पास ।
जो उधार दे सके , कोई वक्त अपना ।
जरूरत के बाजार में , बेच चुका है ।
हर कोई यहाँ , वक्त अपना ।
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कोई तो होना चाहिए , इंतज़ार करने वाला ।
वरना सफर में कदम , आवारा हुए जाते है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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