वो कोई अब नहीं पूछता , हाल ए दिल । बनते फिरते थे जो हकीम , हमारी सलामती पर । शिफा की जरूरत थी अब , और वो नदारद है , हमारी गम ए महफिल से । आंखे पथरा गई है , उनकी राह निहारते । न जाने वो हमारी सूनी महफिल में , आएंगे कब। ✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
पास जब तुम होते हो ,
मन आंगन में खुशियों , का अम्बार होता है ।
जब तुम दूर होते हो ,
तो मन बिरह अग्नि में , जल उठता है ।
ये कैसी लग्न लगी है , कान्हा !
तुम बिन यह दुनिया मोहे , शमसान लगता है ।
राधे ! राधे !
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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