क्या कहूँ शब्द अश्क बनकर बह रहें है , देखकर नज़ारा चमन ए बर्बादी का ।
अब तो ऊपर वाला ही जाने ये , किसकी है यह जादू गिरी ।
मिला रहे साख़ मिट्टी में जो , अपने पुरख शहीदों की ।
खंज़र तेरी पीठ पर भी , यह इक दिन धोखे से चलाएगा ।
खुली है आँख जो तेरी , तो देख जमाने में करतूत इनकी ।
जिधर भी तू नज़र दौड़ायेगा , गद्दार कातिल तू इन्हें ही पायेगा ।
मैं नही कहता ये सब , मैंने देखा है खबरों की सुर्खियों में ।
किस्से इनके , कारनामों के ।
जल उठे है देश के देश कई , बदल गए मज़हब उनके ।
रही तलवार प्यासी फिर भी इनकी , प्यास अभी भी बाकी है इनकी ।
अब निशाना हिन्द है इनका , गजवा ए हिन्द के मंसूबे लिए ।
मचाने को कोहराम हिन्द में अब , साजिशें है ये रचते हुए ।
राज लोभ सत्ता के लालच में , आ कर ।
कुछ ग़द्दार हम में से ही है ,मदद इनकी करते हुए ।
वरना कहाँ होती हिम्मत इनकी , हमें आँख दिखाने की ।
मिटा सका है न कोई बजूद हमारा , न कोई मिटा सकेगा ।
अजय अमर है सनातन हमारा , भगवा सदा आसमान में ऊंचा लहराता रहेगा ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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