थी जो तलास मुझे , वो तलास अब खत्म हुई ।
मिल गए हो तुम मुझे जो मेरा हमदर्द मेरे दोस्त , मेरा हमराज़ बनकर ।
तुम्हीं हो मेरे तसब्बुर में हर दम , मेरी हर नज़्म ओ ग़ज़ल तुम्हीं से है ।
सजती है मेरे दिल की महफ़िल , अब तुम्हारे ही जमाल से ।
रहूँ कहीं मैं मगर , दिल तेरे ही करीब है ।
ये जादू है तेरी निगाहों का ,
वल्लाह ! क्या कमाल है ,क्या कमाल है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूडी
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